गुरुवार, 3 मार्च 2016

इन्टरनेट के इस दौर से पहले एक दौर था जब ज़िन्दगी कि वजह से लोग वाकई में बिछड़ जाते थे और उनसे दुबारा मिल पाने कि गुंजाइश काफी कम होती थी, और अगर कभी मुलाक़ात हो भी जाये तो वो किस्मत की बात होती थी

इन्टरनेट के इस दौर से पहले एक दौर था जब ज़िन्दगी कि वजह से लोग वाकई में बिछड़ जाते थे और उनसे दुबारा मिल पाने कि गुंजाइश काफी कम होती थी, और अगर कभी मुलाक़ात हो भी जाये तो वो किस्मत की बात होती थी |
प्रीति-कथा में दो लोग (विनीत और केतकी)  ऐसे ही सालों बाद एक कांफ्रेंस में दिल्ली में मिलते हैं | विनीत दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर है और एक प्रसिद्ध लेखक भी (पर कहानी में ज्यादा फर्क इस बात से पड़ता है की  विनीत कभी जमशेदपुर में कॉलेज में पढता था और उच्चशिक्षा के लिए दिल्ली चला गया था |) और केतकी कनाडा में रिसर्च करती है और वहां के नागरिक डॉ.  डेविड पैटरसन के साथ विवाहित है |
खैर, विनीत को जरा अंदेशा है की कांफ्रेंस में केतकी (उसके जमशेदपुर के दिनों कि एक सहपाठी) अपना व्याख्यान देने आने वाली है | (विनीत को ये पता था कि कॉलेज के दिनों में केतकी के मन में उसके प्रति आकर्षण था) |
विनीत दुविधा में है कि वो केतकी से मिले या न मिले पर अपनी दुविधा त्याग कर वो केतकी से मिलता है | और फिर उन दोनों की बातचीत की शुरुवात होती है और इसी के साथ उपन्यास की भी |
औपचारिक बातचीत में विनीत के शादी-शुदा होने का जिक्र आता है और साथ में उसके M.A (दिल्ली विश्वविद्यालय) कि पढाई के दौरान उसके MA के प्रेम-प्रसंग का भी (केतकी के पूछने पर विनीत कहता है कि वह प्रेम बड़ा विचित्र था | केतकी- “क्यों ?” , विनीत- “क्योंकि वह MA का प्रेम था”) |
यह उपन्यास तीन प्रसंग को प्रस्तुत करता है –  विनीत के MA के प्रेम प्रसंग का , केतकी के कॉलेज के समय का विनीत के प्रति आकर्षण और दोनों की यथास्थिति का |
कहानी के कुछ अंश प्रस्तुत हैं –
  • केतकी- “थक गई हूँ, ज़रा हाथ -मूंह धोकर आराम से बैठूंगी तो किस्सा सुनाउंगी अपने विवाह का “| विनीत – “अपने विवाह का या अपने प्रेम का” ? “विवाह का “ | केतकी बहुत स्पष्ट शब्दों में बोली “उस सारे प्रकरण को मैं आज तक प्रेम कि संज्ञा नहीं दे पाई ”| विनीत ने कौतुक भरी दृष्टि उस पर डाली : परदेस में एक अमरीकी ईसाई से स्वेक्षा से विवाह ! और वह भी बिना प्रेम के ?
  • विनीत- “अनास्था और संशय से आज तक किसी का भला नहीं हो रहा …”
  • “प्रत्येक घाव में ज़बान तो होती ही है”
  • “जाने क्या बात थी, मन मांग कुछ नहीं रहा था, देने पर ही तुला हुआ था”|
  • जब उससे मोह था, तो यही मानता था कि उससे प्रेम करता हूँ”| विनीत बोला – “आज भी जब उसकी चर्चा होती है, या उससे आमना – सामना होता है, तो एक पुलक, एक सिहरन सी मेरे तन-मन में दौड़ जाती है | फिर भी यह सत्य है कि मैंने कभी लौटकर वापस उसके पास जाने कि बात नहीं सोची | कभी रोया पछताया भी नहीं | उसके बाद दूसरा प्रेम-प्रसंग चला, वह सफल रहा, शोभा के साथ मेंरा विवाह हुआ | और मैं आज भी मानता हूँ कि मैं मल्लिका के प्रति भी इमानदार था और शोभा के प्रति भी| विनीत ने रूक कर केतकी को देखा, “अब यह तुम्हारे दर्शंशास्त्रिय शोध का काम है कि वह जांच करे कि क्या एक व्यक्ति जीवन में एक से अधिक प्रेम कर सकता है ? यदि वह एक से अधिक बार प्रेम करता है तो क्या वह बेईमानी कर रहा है ? क्या उसके ऐसे प्रेम को प्रेम माना जाएगा, जिसके छूट जाने के बाद उसे टीस तक नहीं होती ?”
        केतकी- “एक समय में एक ही डोंगा ले जाओगे या दोनों एक साथ ले जाओगे ?” केतकी ने मटर-पनीर की सब्जी डोंगे में डालते हुए पूछा |
  • “उसका हृदय धडकता भी होगा तो उसके अपने कानो को भी सुनाई नहीं पड़ता होगा ” |
  • “वैसे स्त्रियों कि यह रुदनशीलता मुझे कभी भी अच्छी नहीं लगी | जब-जब ऐसे अवसर आये , मुझे सदा यही लगा कि यह रोना जैसे मुझ पर एक ऐसा आरोप है, जिसकी कहीं सुनवाई नहीं है ”|
  • “मेरी सुरक्षा में कैसी निश्चिंत बैठी थी वह, और मैं धन्य हुआ सा खड़ा था” |
  • “उस क्षण उसने जिन आँखों से मुझे देखा, उनका वर्णन बहुत ही कठिन है | जैसे वे आँखें कह रही हों, सब कुछ जानते-समझते भी मुझसे ही कहलवाना चाहते हो ? मुझे बाध्य मत करो” |
  • “ इतनी जगहों पर एक साथ मत जियो| विनीत हंस पड़ा “बहुत बिखर जाओगी” | केतकी- “ मैं जानती थी , तुम मेरी भावुकता का मजाक उड़ाओगे” |विनीत-“ मैं भावुकता का मज़ाक उड़ा सकता हूँ, पर भावना का नहीं” |
  • “फिर मैंने उसके विषय में सोचना बंद कर दिया ”| विनीत कि शांति जैसे कुछ और गहरी हो गई, “मैं अपने विषय में सोचने लगा | मेरे लिए यह ज्यादा महत्वपूर्ण था और है कि मैं उससे प्रेम करता था या नहीं ?”
  • विनीत – “यह ना-समझी मेरे जीवन में बहुत काम आई” |
यह उपन्यासन न केवल प्रेम – कहानी सुनाता है, बल्कि प्रेम पर एक प्रेक्षक की हैसियत से एक अलग नजरिया प्रस्तुत करता है और इसलिए मैं इसे हिंदी के चुनिन्दा उपन्यासों में से एक मानता हूँ |
जरुर पढ़ें.

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